सूखे दरख्तों पर अब फूल नहीं खिलता,
जो हो जाए जुदा वो फिर नहीं मिलता।

अँधेरे मे अब निकलना पड़ता है गली से,
चौखट पर अब किसी के दीपक नहीं जलता।

ये भीड़ से भरी दुनिया सिर्फ दिखावा है ,
मसरूफियत इतनी कि कोई खुद से नहीं मिलता।

हर शख्स कि जुबां पर अंग्रेजियत का फितूर है,
अब तो दादा भी पोते से हिंदी नहीं बोलता।

किसी और से तो गिला करना भी  फिजूल है सचिन ,
 कोई तुम्हारा अपना भी तो तुम्हारा जिक्र नहीं करता।